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खुशखबरी! ग्लूटेन एलर्जी वाले अब खा सकेंगे नई तरह की गेहूं की रोटी

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नर्मदापुरम
ग्लूटेन (प्रोटीन) एलर्जी के मरीजों के लिए गेहूं के आटे से बनी रोटियां खाना मुश्किल होता है। मध्य प्रदेश सरकार पवारखेड़ा अनुसंधान केंद्र की अखिल भारतीय गेहूं परियोजना में गेहूं का नया बीज तैयार करवा रही है। इसके आटे से रोटियां खाने से मरीजों को एलर्जी नहीं होगी। वैज्ञानिकों ने इस पर शोध शुरू कर दिया है। तीन साल की फील्ड ट्रायल के बाद गेहूं की नई किस्म तैयार हो जाएगी। गेहूं में ग्लूटेन की मात्रा बहुत कम करने के लिए अनुसंधान केंद्र के वैज्ञनिकों ने देशभर से विभिन्न किस्मों के गेहूं के सैंपल लिए हैं। इन सैंपलों को जबलुपर के फूड साइंस प्रयोगशाला में भेजा गया है। यहां सबसे कम ग्लूटेन वाली किस्मों को चिनिह्त किया जाएगा। इनकी स्क्रेनिंग कर वैज्ञानिक देखेंगे कि बीजों में ग्लूटेन प्रोटीन को और कम कैसे किया जाए। इस पर विभिन्न प्रकार के प्रयोग करेंगे। वैज्ञानिको की देखरेख में अनुसंधान केंद्र के खेतों में अलग-अलग वैरायटी को लगाया जाएगा।
 
यह देखा जाएगा कि हर साल बनाए गए बीज से कितना ग्लूटेन कम हुआ। इसका आंकलन भी होगा। तीन सालों तक यह शोध होने के बाद सबसे कम ग्लूटेन के गेहूं का बीज तैयार होगा। केंद्र इसे सरकार को देकर पेटेंट कराएगा। इसके बाद गेहूं बाजार से किसानों तक पहुंचेगा। अनुसंधान केंद्र के वैज्ञनिकों के मुताबिक लगभग 20 हजार लोगों में किसी एक को ग्लूटेन एलर्जी होती है। गेहूं में ग्लूटेन होता है। इसकी रोटी खाते ही मरीज के पेट की छोटी आंत में एलर्जी होने लगती है। इससे कई तरह की परेशानी सामने आती हैं।

अभी तक नहीं हुआ ग्लूटेन पर कोई शोध
वैज्ञानिकों के मुताबिक देश में ग्लूटेन एलर्जी के मरीजों की संख्या कम होने के कारण यह रिकार्ड नहीं की गई है। मरीजों के लिए कम ग्लूटेन के गेहूं को लेकर अभी तक प्रदेश और देश में कोई शोध नहीं हुआ है। मध्य प्रदेश में पवारखेड़ा अनुसंधान केंद्र में पहली बार इस पर काम कर रहा है। तीन साल के फील्ड ट्रायल के बाद इसे तैयार किया जाएगा। और किसानों को उगाने के लिए दिया जाएगा।

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अनुसंधान केंद्र ने देश को दी 56 गेहूं की किस्म
जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय के प्रदेश में सागर, जबलपुर, पवारखेड़ा में तीन अनुसंधान केंद्र हैं। इसमें पवारखेड़ा का अनुसंधान केंद्र की स्थापना 1903 में की गई थी। केंद्र की अखिल भारतीय गेहूं परियोजना ने अभी तक देशभर में मिलने वाले 56 प्रकार के गेहूं की प्रजातियां विकसित कर किसानों को दी हैं। जिनका किसान उपयोग कर रहे हैं।

गेहूं का नया बीज तैयार कर रहे
केके मिश्रा, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रभारी अखिल भारतीय गेहूं परियोजना पवारखेड़ा नर्मदापुरम  ने बताया- ग्लूटेन के मरीजों के लिए गेहूं का नया बीज तैयार कर रहे हैं। इसमें ग्लूटेन की मात्रा सबसे कम होगी। इसको खाने से मरीज को एलर्जी नहीं होगी। विभिन्न किस्मों के गेहूं के सैंपल प्रयोगशाला भेजे गए हैं। कम ग्लूटेन वाले किस्मों पर तीन साल तक फील्ड ट्रायल कर नया गेहूं का बीज बनाया जाएगा।

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