Home विदेश तेल से बैंकिंग नेटवर्क तक ईरान पर चौतरफा वार, ट्रंप के ‘D-डे...

तेल से बैंकिंग नेटवर्क तक ईरान पर चौतरफा वार, ट्रंप के ‘D-डे प्लान’ से बढ़ा तनाव

3
0
Jeevan Ayurveda

वांशिगटन
 अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए नए और कड़े कदमों का ऐलान किया है। इसका मुख्य उद्देश्य केवल ईरानी संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाना नहीं है, बल्कि दुनिया भर के उन देशों, बैंकों और कंपनियों को निशाना बनाना है जो ईरान को वित्तीय या व्यावसायिक सहायता प्रदान कर रहे हैं। कूटनीतिक बातचीत ठप होने और पिछले युद्धविराम समझौतों के विफल होने के बाद अमेरिका एक बार फिर आर्थिक दबाव के जरिए ईरान को रियायतों के लिए मजबूर करने की कोशिश कर रहा है

क्या है ट्रंप का डी-डे प्लान?
डोनाल्ड ट्रंप का इकोनॉमिक D-डे ईरान के खिलाफ शुरू किया गया एक ऐसा आर्थिक युद्ध अभियान है जिसमें अधिकतम दबाव डाला जा रहा है। इसका मकसद ईरान की बची-खुची ग्लोबल कमाई के जरियों को पूरी तरह खत्म करना, तेल की तस्करी और फ्रंट कंपनियों के जरिए होने वाले लेन-देन को रोकना और किसी भी ऐसे देश, कंपनियां या आर्थिक संस्थान को सजा देना है जो ईरान को आर्थिक मदद या सहारा देता है।

Ad

अमेरिका का पहला लक्ष्य शैडो इकोनॉमी पर प्रहार कर उसे खत्म करना है। इसके तहत ईरान के प्रतिबंधित तेल व्यापार को चलाने वाले नेटवर्क, तीसरे देशों के जरिए वित्तीय लेनदेन और धोखाधड़ी से चलाए जा रहे लॉजिस्टिक्स को बंद करना शामिल है। अमेरिका ऐसे जहाजों पर कार्रवाई की योजना बना चुका है जो स्वचालित पहचान प्रणाली बंद करके समुद्र में एक जहाज से दूसरे जहाज में तेल ट्रांसफर करते हैं।

ईरानी अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार
अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि हालिया सैन्य अभियानों में ईरान की नौसेना, वायु रक्षा प्रणालियों और हथियार उत्पादन क्षमता को भारी नुकसान पहुंचा है। सैन्य नुकसान के साथ-साथ अब व्यापक आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए ईरान की विदेशी मुद्रा आय को पूरी तरह से सुखा कर देने की योजना है। इससे सरकार के दैनिक कामकाज, घरेलू अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय सैन्य अभियानों को फंडिंग मिलना बंद हो जाए।

क्या ईरान और उसके पार्टनर देश इसे सहन कर पाएंगे?
ईरान पिछले लगभग पांच दशकों से अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ही ईरान ने प्रतिबंधों से बचने और वैकल्पिक व्यापार मार्ग बनाने में महारत हासिल की है। ईरान के समुद्र के जरिए निर्यात होने वाले तेल का 80% से अधिक हिस्सा चीन खरीदता है। चीन की रिफाइनरियां डॉलर के अलावा दूसरी करेंसी के जरिए यह व्यापार करती हैं।

भारत और तुर्की दोनों ही देशों के चीन के साथ मजबूत संबंध हैं। लेकिन दोनों ने ही संयुक्त राष्ट्र (UN) के बाहर लगाए गए एकतरफा प्रतिबंधों को मानने से इनकार किया है। यूरोपीय देश ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंतित हैं, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण उनकी कानूनी कंपनियों पर भी गाज गिर सकती है। संयुक्त अरब अमीरात ने 18 अगस्त को ईरान के साथ सभी व्यापारिक और वित्तीय लेनदेन निलंबित करने का बड़ा ऐलान किया है। दुबई ऐतिहासिक रूप से ईरान का प्रमुख व्यापारिक केंद्र रहा है, इसलिए यह फैसला ईरान के लिए बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है।

इकोनॉमिक डी-डे के जोखिम
अमेरिका अब ब्लॉकचेन एनालिसिस, सैटेलाइट इमेजरी और एडवांस ट्रैकिंग सिस्टम के जरिए शैडो नेटवर्क का पता लगा रहा है, जिससे ईरान के लिए रास्ता काफी कठिन हो गया है। इतिहास गवाह है कि एक नेटवर्क बंद होने पर दूसरा तुरंत खड़ा हो जाता है। रूस और चीन के साथ ईरान के संबंध अमेरिका के लिए सैन्य या आर्थिक रूप से बाधित करना मुश्किल हैं। अत्यधिक आर्थिक दबाव का उल्टा असर भी हो सकता है। यदि ईरानी नेतृत्व को लगता है कि आर्थिक राहत की कोई गुंजाइश नहीं बची है तो वह वार्ता के बजाय ड्रोन हमलों, बैलिस्टिक मिसाइलों और समुद्री मार्गों पर दबाव बनाकर संघर्ष को और बढ़ा सकता है। ट्रंलांकि औपचारिक बातचीत फिलहाल निलंबित है, लेकिन अमेरिका ने कूटनीति का रास्ता पूरी तरह से बंद नहीं किया है।प प्रशासन का अंतिम लक्ष्य ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना है।

Jeevan Ayurveda Clinic

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here